<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239</id><updated>2011-12-07T03:37:23.829+05:30</updated><title type='text'>खम्मा घणी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>7</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-8645108872989651099</id><published>2009-12-02T18:15:00.004+05:30</published><updated>2009-12-02T18:33:26.213+05:30</updated><title type='text'>प्रो. कल्याणमल लोढ़ा -  अंतिम शिष्य की स्मृतियों से</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अपने जीवन के अंतिम काल में लगभग पांच साल प्रो. कल्याणमल लोढ़ा जयपुर रहे थे और मुझे यह सौभाग्य मिला कि यहां मैं लगभग शुरू से ही उनके सान्निध्य में रहा। वे मुझे अक्सर कहा करते थे कि अब तू मेरा शिष्य है, मेरा अंतिम शिष्य, मेरा मानस पुत्र है.. अपने जीवन सूत्र को मुझसे उन्होंने यूं बांटा था- धर्म न अर्थ न काम रूचि, गति न चहौं निरवाण, जनम जनम गति वाक में ,यह वरदान न आन।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;उनके जाने का समाचार अप्रत्याशित नहीं था पर दुखद तो था ही। जिन्होंने अपने नवें दशक की जिंदगी जीते हुए छायावाद से लेकर आज तक हिन्दी साहित्य को जिया था। और अपने युग के शीर्ष जनों यथा- बच्चन, पंत, निराला, महोदेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा और धीरेंद्र वर्मा आदि के साथ वे करीबी रहे। इसीलिए उन्हें छू के मुझे हिंदी साहित्य की युगानुभूति अगर हुई कि जिस हाथ का सहारा देकर उन्हें खड़ा किया कि इस हाथ को उनके समकालीन हिंदी के कालजयी लेखकों छुआ है तो मैं मिथ्या अभिमानी तो नहीं कहलाउंगा ना?  अपने जीवन के अंतिम काल में लगभग पांच साल प्रो. कल्याणमल लोढ़ा जयपुर रहे थे और मुझे यह सौभाग्य मिला कि यहां मैं लगभग शुरू से ही उनके सान्निध्य में रहा। एक मित्र के माध्यम से परिचय हुआ था, फिर उस मित्र से अधिक निकटता मेरी उनसे हो गई। बढ़ती उम्र के साथ-साथ बिमारी से उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था और वे पूर्ण रूप से एक कमरे में सिमट कर रह गये थे। उनकी दुनिया वही तक सीमित हो गई थी, एक नौकर के भरोसे जो बदलते रहते थे। एकांत में अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी जब तक उनकी मस्तिष्क की चेतना साथ देती रही, वे पढ़ते रहे, लिखते रहे, अवस्थ्यता के कारण उनके हाथों की उंगलियां काम नहीं करती थी तो लिखने में उन्होंने मुझे अपना सहायक बना लिया। वे बोलते रहते और मैं कागज पर उनकी साहित्यधर्मिता को मूर्त रूप देता रहता था। अपने निजी मित्रों को पत्र लिखवाना, पुराने नोट्स जो उन्होंने कभी पहले अपने हाथों से लिख रखे थे उनके आधार पर पाण्डुलिपियां तैयार करवाना आदि। वृद्धावस्था के कारण उनको सुनाई कम देता था परन्तु आंखें और याददाश्त उनका साथ दे रही थी। उन्हें यहां तक याद रहता था कि कौनसी किताब के किस पेज नम्बर पर क्या लिखा है। लेकिन शरीर बेजान हो गया था। पुराने दिनों को याद करते हुए कहते थे कि मेरी असली पूंजी तो वह है जो मैंने लिखा है। सारे रिश्ते-नाते, धन-सम्पदा बेमानी है जो एक दिन यहीं रह जायेंगे। वे अक्सर गुनगुनाते हुए कहते थे कि ''सब ठाठ पड़ा रह जायेगा, जब लाद चलेगा बंजाराÓÓ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी की मृत्यु के बाद वे टूट गये अक्सर यह बात बातों ही बातों में कहते थे कि उसके जाने के बाद अकेला हो गया हंू। ऊ ंचा सुनने के कारण उनके कई परिचित व मित्र जिनके नाम बहुत बड़े हैं मैं लेना नहीं चाहंूगा, उनके फोन काट दिया करते थे या रिसीव ही नहीं करते थे। इस पर वे उदास हो जाते व कहते कि अब मैं इन लोगों के काम का नहीं रहा हंू। क्योंकि अब मैं किसी कमेटी में नहीं हंू, कोई सत्ता मेरे पास नहीं है ये क्यों बात करेंगे मुझसे। अपने जीवन सूत्र को मुझसे उन्होंने यूं बांटा था- धर्म न अर्थ न काम रूचि, गति न चहौं निरवाण, जनम जनम गति वाक में ,यह वरदान न आन।जयशंकर प्रसाद और सूरदास उनके प्रिय कवि थे, इनके ऊपर उन्होंने भरपूर लिखा भी। कामायनी पर उनके अद्भुत व्याख्यान के चर्चे तो मैंने कई लोगों के मुंह से सुने हैं। साथ ही आध्यात्म उनका प्रिय विषय था, स्वामी प्रत्ज्ञात्मनांनद सरस्वती जी से गुरूमंत्र लेने के बाद वाक श्रृंखला लिखी- वाक तत्व ,वाग्विभव, वागदोह, वागद्वार वागमिता, वाकपथ, वाकसिद्ध आदि। उनक ी अंतिम पुस्तक दिव्य प्रतीक पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुई जिसकी पाण्डुलिपि तैयार करने का मौका मुझे प्राप्त हुआ था। वे मुझे अक्सर कहा करते थे कि अब तू मेरा शिष्य है, मेरा अंतिम शिष्य, मेरा मानस पुत्र है, आज मेरे शिष्य मुझसे बात भी नहीं करते हैं। उनके पास आए कई सिफारिशी पत्र मैंने उन्हें पढक़र सुनाए थे, विशेषकर पुरस्कारों को दिलवाने के लिए कि आप मेरी सिफारिश करें, तब वे दु:खी होकर कहते थे कि क्या भूख जग पड़ी है लोगों में कि पुरस्कार लेने के लिए भी सिफारिश की बात करते हैं। अपने जीवन के कई ऐसे प्रसंग हुए कहते थे कि ये सिर्फ मैं तुझे बता रहा हंंू, पता नहीं तुझसे मेरा पिछले जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा। उन्होंने कहा था कि दिनेश, पहली बार तुम्हें बता रहा हूं, मंचों और व्याख्यानों में गुरू और सरस्वती को याद करके ही बोला करता था। उनका मुझ पर स्नेह और मेरा स्नेहाधिकार ही कहूंगा कि उनके सेवक कु छ मनवाने के लिए मुझसे आग्रह करते थे, मेरी स्मृति में उन्होंने मेरा आग्रह टाला भी नहीं। हिन्दी साहित्य का यह पुरोधा अपने -आप में एक जीता-जागता साहित्यिक कोष था। उनके सान्निध्य में अहसास हुआ कि उन्हें बंगाल में हिंदी का भागीरथ व्यर्थ ही नहीं कहा गया।  उनके प्रिय रचनाकारों की रचनाएं तो उन्हें मुख जबानी याद थी। जब बोलते थे तो मुझे अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति के लिए ऐसा लगा कि साक्षात सरस्वती कण्ठों पर विराजने का मुहावरा इनके लिए ही बना है। पर अफसोस उनकी एक हसरत बाकी रह गई, वे चाह रहे थे कि एक पुस्तक उनकी और मेरी साथ में छपे परन्तु यह हो नहीं सका, उनकी चाहत अधूरी रही और मेरा दुर्भाज्य, इसका मुझे दु:ख है। पर उनका इतना सुखकर एवं गौरवपूर्ण  सान्निध्य ही मेरे लिए जीवनपर्यंत अक्षय निधि नहीं है क्या?&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-8645108872989651099?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/8645108872989651099/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=8645108872989651099&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/8645108872989651099'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/8645108872989651099'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2009/12/blog-post_02.html' title='प्रो. कल्याणमल लोढ़ा -  अंतिम शिष्य की स्मृतियों से'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-908698213101972087</id><published>2008-11-22T11:00:00.004+05:30</published><updated>2008-11-22T13:16:07.042+05:30</updated><title type='text'>मेरी कहानी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SSeh1CRy1HI/AAAAAAAAAFI/0uAQ1Bq2K_c/s1600-h/kamaychaa.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5271359821377098866" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 303px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SSeh1CRy1HI/AAAAAAAAAFI/0uAQ1Bq2K_c/s400/kamaychaa.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मेरी ये कहानी डेढ़ साल पहले राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित हुई,अक्टूबर 2007 में कहानी स्नेह से दुर्गाप्रसाद जी ने वेब पत्रिका &lt;a href="http://www.indradhanushindia.org/magazine/oct2007/3.htm"&gt;इन्द्रधनुष इंडिया&lt;/a&gt; पर प्रकाशित कर दी थी.. आज कहूँ कि पहली कहानी पर इतनी सुखद और प्रिय प्रतिक्रियाएं मिलीं कि अभिभूत हुआ..मित्रों के लाख कहने पर उसके बाद से लिख नहीं पाया ..मित्रों ने उलाहने दिए हैं कि माननीय चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की तरह से एक कहानी से महान होना चाहता हूँ..शायद ये उलाहने और..ताने कुछ और बेहतर लिखवादे तब तक..एक बार फ़िर वही कहानी आपके सम्मुख प्रस्तुत है ..&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;कामायचा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शायद रत्नाकर के गर्भ से एक नयी सभ्यता का उदय हो रहा था, या मानव सभ्यता की सृष्टि-आज फिर कोई वराह पृथ्वी को उबार रहा हैं। मनु की तरह निर्जन में बैठा सुगना अपने झौपड़े की फुनगी की टोह ले रहा था, कि कब पानी उतरें और सिर ढ़कने का आसरा मिले। चिन्तामग्न सुगना की स्थिति जल प्लावन के बाद हिमालय पर बैठे शोक संतप्त मनु जैसी थी। फर्क था तो बस इतना कि मनु हिमालय पर्वत पर थे और सुगना रेत के टीबे पर। यह फर्क तो होना ही था, क्योंकि एक सृष्टि का नियन्ता था और दूसरा नियति।आठ दिन पहले पानी को तरसने वाले इस रेत के सागर पर काली घटाएं छायी थी। जेठ की गर्मी से झुलसी घरती को राहत मिली, सूखते पेड़ों में एक नयी चाहत जगी, मानवीय जिजीविषा हरहराने लगी। सुगना का आठ साल का पोता करमा दौड़ा-दौड़ा आया और कहने लगा - 'बाबा बादली आयी है, मेह आवैला।' साठ साल के सुगना ने अपने जीवन में ऐसी अनगिनत बदलियों को देखा था जो तृप्त न कर तृषित करती हुई चली गई। कई बार कामायचा लेकर मल्हार गाया पर बदलीर हर बार रूठ कर चली ही गई। पानी को तरसने वाले इन लोगों की नियति में यही बदा थी। बदली को आते देख बाछें खिल उठती थी और बिजलियों की चमक ऑंखों में चमक उठती थी, लेकिन बिना बरसे ही अपने साथ लाये पानी को वापस ले जाते देख बची रह जाती थी इनकी ऑंखों में निरीहता, निराशा । क़रमा झोंपड़े में से कामायचा ले आया ओर तारों को झंकृत कर गाने लगा - 'रिमझिम बरसों बादली इण धोरां वाले देश ।' संध्या आज दो घड़ी पहले ही आ गई है, बादलों के कारण । क़रमा कि उंगलियों को कामायचे पर साधते हुए, बजाने के गुर समझाते हुए सुगना अपने पुरखों से प्राप्त थाती अपने पोते के सुपुर्द कर रहा है। परम्परा का निर्वहन करते हुए, पूर्वजों के ऋण से उऋण हो रहा हैं । सुगना की कई पीढ़िया कामायचा बजाकर गीत गाकर अपना पेट पालती आई है। इस परिवार के लिए भी कामायचा कमाई की कामधेनु है। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की कौंध के साथ बारिश की बूंदें गिरने लगी। सुगना का मन हरसाने लगा, अबकी बार कई वर्षो से नही निपजी धरती पर बाजरी और मोठ के अंकुर सुगना के हृदय में फूटने लगे। इस आशंका के साथ कि अगली बारिश कैसी होगी ? तभी रमली गरमागरम गुलगुले (गुड़ के पकोड़े ) ले आयी, करमा हाथ से ही झपटकर खाने लगा। रमली आकर पास में बैठ गई और सुगना से बतियाने लगी - 'अबकी रामजी किरपा करैला।' आज रमली की ऑंखों में चमक थी, चेहरा खिल गया, उस दिन की तरह जिस दिन सुगना से ब्याही थी।&lt;br /&gt;क्योंकि इन लोगों के लिए बारिश उपहार से कम जो नहीं है। बारिश होते दो घड़ी हो गई है, आज कई बरसों बाद बरसा है इतना पानी और बरस रहा है, इतना बरसा कि सुगना ने अपने जीवन में आज तक नहीं देखा।&lt;br /&gt;''दिन उगै कोठा में पड़ी बाज़री निकाल ने देख लीजे कठै जीव तो नीं पडग्या है'' कुदाली और कवाड़ी (कुल्हाड़ी) निकाल देने की बात कहकर अमृत बूंदों का स्पर्श पाता सुगना पास के झोंपड़े में सोने चला गया। फूस से छाया, गारे से बना झोंपड़ा बरसात के पानी को अन्दर आने से रोकने में सक्षम है । क़ितनी जबरदस्त तकनीक है उन पूर्वजों की जिन्होंने झोंपड़े बनाने की कला का इजाद किया था। फूस की छावन को ढ़ाल उतारकर इस तरह व्यवस्थित कर रखा कि बारिश का सारा पानी ढ़लकर नीचे आ जाता है।&lt;br /&gt;शुक्ल पक्ष की चौदस (चतुर्दशी) की रात भी आज अमावस (अमावस्या) सी लग रही थी क्योंकि चांद को तो अपने ऑचल की ओट में रखा था बादलों ने। आधी रात ढ़लने पर रमली नवोढ़ा की तरह सुगना के पास आयी और कहने लगी 'आज इन्दर राजा रूठगों है, बरसात रूकण रो नाम नी लेवे बरसती जावै है।' 'बावली इन्दर रूठियों कोनी राजी व्हेगो है, अबकी खेतां में चोखों धान निपजैला।' पास ही बाड़े में बंधी गायों और बकरियों की रंभाने की आवाज आ रही थी जो बारिश से भीगकर ठिठुर रही थी। आस-पास से कुत्तों और सियारों की क्रन्दन भरी भयानक आवाजे आ रही है, शायद इन मूक पशुओं की वह अदृश्य इन्द्रि जाग गयी हैजो इन्हें प्राकृतिक आपदा से पहले आभास करवा देती है। 'कुत्ता स्यालियाँ कुरलावै हैं कोई न कोई विपद आवेला' कहते हुए रमली सुगना की बाहों में सिमट गई। दिन निकला बारिश रूकी नहीं एक दिन दो दिन पूरे तीन दिन बारिश होती रही, कभी झिरमिर-झिरमिर तो कभी तेज बौछारों के साथ ग़ाँव में पानी इकट्ठा होता दिखाई देने लगा। जो रेत बरसों से प्यासी थी इतनी तृप्त हो गई लगता है उसमें से ही पानी का स्त्रोत फूट पड़ा हो।&lt;br /&gt;अचानक रात मे अरे सुगना दौड़ बाढ़ आयगी हैं धरमा, ईसरा,गणेशा, दौड़ों रे दौड़ों । अपने-अपने घरों से बच्चों -बूढ़ों के साथ लोग सामान लेकर रेत की टीबों पर भागने लगे है, बाढ़ का पानी गाँव में आ गया है। इस काली रात में कई लोग टीबों पर पहुंच गये और बाकी बाढ़ में घिर गये बह गये, बिछुड़ गये शायद हमेशा की लिए। लोगों की जाग होती तब तक तो बाढ़ ने गॉव को घेर लिया था। सुगना सामान लेकर टीबे की ओर दौड़ा जैसे ओलम्पिक का धावक दौड़ रहा हो रमली, बेटे-बहुओं को जल्दी सामान लेकर आने का कहते हुए। मौत के डर ने साठें सुगना में भी स्फूर्ति ला दी थी। मनुष्य डरता केवल मौत से ही है अगर मौत का डर न हो तो प्रकृति का यह निष्ठुर जीव&lt;br /&gt;प्रकृति की सत्ता को ही ठुकरा दे भगवान को ही न माने उसे भी चुनौती दे डाले, पशुओं से भी ज्यादा हिंसक व क्रूर हो जाये। सुगना टीबे तक पहुॅचा तब तक तो बाढ़ विकराल रूप से आ गई थी। सुगना रमली को आवादेता हुआ, झौंपड़े की ओर भागा पर पानी के वेग ने आगे नहीं बढ़ने दिया। सुगना चिल्लता रहा पर पानी के कोलाहल में सुगना की आवाज दब गई। प्रकृति की आवाज में मानव की आवाज कहा तक जा पाती ? दिन उगने वाला था सूरज की प्रतीक्षा से ज्यादा आज सुगना को रमली और बच्चों की प्रतीक्षा थी, परन्तु यह प्रतीक्षा चिर प्रतीक्षा में तब्दील हो गई सारा गॉव काल कवलित हो गया था क़ुछेक लोग टीबों पर पहुंच गये थे। रेत का दरिया आज पानी के दरिया में तब्दील था।&lt;br /&gt;जहां कभी पीने के पानी को लोग तरसते थे, वहां आज पानी का अथाह सागर दिख रहा है। टीबें पर बैठे सुगना की स्मृतियां ताजा हो रही है छ: कोस दूर से ऊटों पर लादकर पानी लाता था। रास्ते में कोई हरियल वृक्ष नहीं जिसकी छाया का आसरा तपती धूप में ले सके, थे तो कुछ खेजड़ी के वृक्ष जो वैशाख - जेठ में ठूंठ हो जाते हैं। ऊंट को रमली के हाथों से गुंथे रंग-बिरंगे धागों से बने गोरबन्द का सिंगार कराके पौ फटने से पहले सुगना पानी लाने निकल पड़ता था। दो छांगल ऊंट की पीठ पर टांग हाथ में पुरखों की निशानी कामायचा लेकर । समुद्र में दिखने वाली पानी की लहरों के समान ही इन रेत के टीबों पर हवा के वेग से लहरें बनी हुई थी, उनको पार करते हुए पानी लाने जाता था। आते वक्त पानी से भरी छांगले ऊंट की पीठ पर होती थी और सुगना ऊंट की मोरी गले में डाले आगे-आगे चलता कामायचा के तारों को छेड़ रास्ते को छोटा करता रहता था। जिस जगह पानी की जबरदस्त कमी थी, गर्मियों के दिनों में सूरज की किरणों से मृगमरीचिका में पानी का आभास करने वाले लोगों के सामने आज रेत से बनी लहरे नहीं पानी की लहरें हिलौंरें मार रही थी। वह पानी जो बादलों से बरस कर भी खारा हो गया था। खारा तो इस कारण कि सुगना जैसे अनेक लोगों की आंखों से बहा करूणा का पानी इसमें मिल जो गया था। वर्षो से अकाल की मार झेल रहे, पानी को तरस रहे, जिजीविषा से जूझ रहे इन लोगों ने सोचा भी नहीं होगा की सुकाल पड़ेगा और इतना भयंकर की अकाल की मार को भी दबा देगा। इस सुकाल से तो अकाल ही भला था इन जलतृषित लोगों के लिए। इनके जीवन में पानी में कभी डुबकी नहीं लगाई उन्हें डूबो ही दिया। जिन्दगी का सारा स्नान अन्तिम स्नान के रूप में कुदरत ने ही करवा दिया। शायद उन्हें अब पानी देने की भी जरूरत नहीं क्योंकि पानी देने वाला बचा ही तो नहीं।&lt;br /&gt;किसी के बचने की तो गुंजाइश ही नहीं थी। सारा गाँव डूब गया, झोंपड़ों के ऊ पानी फिर गया था, गॉव का नामों-निशान नहीं दिख रहा था। सुबह खेजड़ी के पेड़ के नीचे गीले कपड़ों में सुगना अचेत पड़ा है बारिश की बूंदा-बादी भी उसे सचेत नहीं कर पा रही है। बाढ़ के पानी को देखकर लग रहा है कि सारी पृथ्वी जल प्लावित हो गई है। खेजड़ी पर बैठी ठिठुरी टिट्हरी की टी-टी से सुगना की मूर्छा टूटी तो आंखों के सामने अथह समुद्र देखकर आंखे जमी सी रही गई, दिल दहल गया चारों और नजर फेरी तो पानी ही पानी आदमी जात की चीज तक नहीं दिखी, जानवर तो दूर की बात है। दिन निकल आया था सुगना जान गया कि सब कुछ चला गया है, कुछ भी नहीं बचा है। रमली की बातें याद आने लगी की इन्दर राजा रूठगो है। शायद रमली को पहले ही पता चल गया था।&lt;br /&gt;खाली पेट पथरायी आंखों के साथ दो दिन हो गये है सुगना खेंजड़ी के पेड़ के नीचे बैठा है अतीत की यादों को लिये। घर से जो सामान बचा लाया था उसमें पुरखों की थाती कामायचा भी था। अकेलेपन में यह कामायचा ही उसका साथी है। पानी की थाह कितनी है सुगना को पता नहीं। तीसरे दिन बचाव दल का हैलीकाप्टर वहां से गुजरा तो सुगना पर उनकी नजर पड़ी। खाने के पैकेट गिराकर हैलीकाप्टर चला गया। चार दिन बीत गये पानी उतरा नहीं। रेत के नीचे जिप्सम की परत थी जो पानी को नीचे जाने से रोके हुए थी। बचाव दलों के सारे कयास धरे रह गये कि रेत पानी सोंख लेगी व पानी जमीन में उतर जायेगा। छठे दिन कुछ पानी उतरा और आदमी जात का नामों निशान सुगना को नजर आने लगा। बचाव दल के लोग उसके पास आये व रोते सुगना को ढांढ़स बंधाने लगे कि लोगों को बचाया है उनमें शायद तुम्हारे परिवार के लोग भी हों। वे पानी उतरने की बात आपस में कर रहे थे कि सुगना बीच में बोल पड़ा 'नीचे खड्डी है पाणी कोनी छुवै'। तब इन आधुनिक भूगोलवेताओं को समझ आया कि नीचे जिप्सम की परत है, उसे छेदे बिना पानी नहीं निकलेगा।&lt;br /&gt;धीरे -धीरे पानी कम होने लगा, सुगना टीबे पर बैठा अपने झोंपड़े की टोह ले रहा था कि शायद उसमें रमली और बच्चे किसी तरह से बचे हों पर यह भ्रम था सुगना का, उस व्यक्ति का जो घोर निराशा से घिरने के बाद भी आशा की किरण का इंतजार करता है। बेसहारा आदमी कहीं न कहीं तो सहारा तलाशता है। सुगना को सहारा मिला कामायचे से। आज कई दिनों के बाद सुगना ने कामायचा बजाया है। पानी से भीगने के बाद कामायचे के ऊपर मंढ़ी खाल फूल गई थी, फिर भी कामायचे के पारखी सुगना ने तारों को कसकर झकृत कर दिया। सुगना गाने लगा, 'कुरजां ऐ म्हारौं भंवर मिलाय द्यों नी । सुगना के कण्ठ से दर्द फूट पड़ा, अंतस में हिलोरे लेता दु:ख का समुद्र गाने के साथ बाहर निकल रहा है। गाते-गाते सुगना की आंखों में अतीत दौड़ पड़ा। इसी कामायचे के साथ उसने जब रंगायन के मुक्ताकाश में गाना शुरू किया तो खचाखच भरें रंगायन में लोग थिरकने लगे थे, हर एक मुग्ध होकर सुगना को निहारते हुए सुन रहा था, विदेशियों ने दाद देते हुए नोटों की बरसात कर दी थी और आज का दिन जब उसका दर्द जाग पड़ा और सुगना गा रहा है मन से पर सूनने वाला कोई नहीं है। पर है उसका साथी कामायचा, क्योंकि जीवन में उसके सिवा उसका कुछ बचा ही नहीं था।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-908698213101972087?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/908698213101972087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=908698213101972087&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/908698213101972087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/908698213101972087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html' title='मेरी कहानी'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SSeh1CRy1HI/AAAAAAAAAFI/0uAQ1Bq2K_c/s72-c/kamaychaa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-762924734489795920</id><published>2008-11-03T21:35:00.002+05:30</published><updated>2008-11-03T21:39:00.316+05:30</updated><title type='text'>अनिल कुम्बले को अलविदा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQ8htIKxgcI/AAAAAAAAAE4/GJfc-v-zTM0/s1600-h/anil-kumble.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5264463548589900226" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 318px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQ8htIKxgcI/AAAAAAAAAE4/GJfc-v-zTM0/s320/anil-kumble.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भारत के महान क्रिकेटर अनिल कुम्बले आखिरकार भारतीय क्रिकेट को अलविदा कह गए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; उनके खेल को सलाम..&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-762924734489795920?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/762924734489795920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=762924734489795920&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/762924734489795920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/762924734489795920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='अनिल कुम्बले को अलविदा'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQ8htIKxgcI/AAAAAAAAAE4/GJfc-v-zTM0/s72-c/anil-kumble.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-6032087763675909041</id><published>2008-10-24T14:20:00.004+05:30</published><updated>2011-08-02T21:39:26.555+05:30</updated><title type='text'>क्षमा करें</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQGOHcfaE4I/AAAAAAAAAEw/sEi_6wnhCQ4/s1600-h/abu1.bmp"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; DISPLAY: block; HEIGHT: 213px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5260642098303603586" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQGOHcfaE4I/AAAAAAAAAEw/sEi_6wnhCQ4/s320/abu1.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;जैसे धोरों में ग्लोबल दुनिया से कट कर एक अलग संसार में रमा हुआ हूँ..ऐसे जैसे वहाँ हूँ जहाँ से मुझे भी मेरी ख़बर नहीं आती... आप सब मित्रों से माफी चाहता हूँ लिख पाने के लिए..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-6032087763675909041?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/6032087763675909041/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=6032087763675909041&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/6032087763675909041'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/6032087763675909041'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='क्षमा करें'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SQGOHcfaE4I/AAAAAAAAAEw/sEi_6wnhCQ4/s72-c/abu1.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-310496550107850902</id><published>2008-05-14T12:10:00.002+05:30</published><updated>2008-12-10T13:00:43.535+05:30</updated><title type='text'>थम सी गई जिन्दगी</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SCqUvyp-V5I/AAAAAAAAADA/aKZwExj87uM/s1600-h/blast.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200132268525246354" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SCqUvyp-V5I/AAAAAAAAADA/aKZwExj87uM/s320/blast.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आम शहरों से शांत रहने वाले शहर जयपुर की १३ मई की शाम दहशत ले आई .दहशतगर्दों की एक घिनोनी हरकत ने फ़िर से मानवता को शर्मसार कर दिया । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;एक के बाद एक लगातार नौं धमाके शहर के परकोटे के भीतर जो शहर का ह्र्द्धय है । आठ बजते बजते तो पूरा का पूरा शहर सहम गया था थम गया था शहर का जीवन अटक गयी थी सांसे ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मौत का मंजर बेगुनाहों के जीवन को लील गया .शांत समझे जाने वाले राजस्थान मे अजमेर के दरगाह शरीफ के बाद दूसरा हादसा । &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्या मिला ऐसे कुकर्त्य से उन दहशतगर्दों को .......!!!!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शर्म और नाकामयाबी के सिवा शायद कुछ भी &lt;span class=""&gt;नही......&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-310496550107850902?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/310496550107850902/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=310496550107850902&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/310496550107850902'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/310496550107850902'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2008/05/mere.html' title='थम सी गई जिन्दगी'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SCqUvyp-V5I/AAAAAAAAADA/aKZwExj87uM/s72-c/blast.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6073947251391202239.post-2455253543642371188</id><published>2008-04-09T11:58:00.003+05:30</published><updated>2008-12-10T13:00:43.669+05:30</updated><title type='text'>तेरी बाली उम्र को सलाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/R_xuO06z5QI/AAAAAAAAAC4/wi-dsetWPb4/s1600-h/jk.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187142071826507010" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/R_xuO06z5QI/AAAAAAAAAC4/wi-dsetWPb4/s320/jk.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;८ अप्रैल को उसके सोलह बरस पूरे हो गए है ,जी मैं बात कर रहा हूँ जयपुर के जवाहर कला केन्द्र की .वास्तुकार चार्ल्स कोरिया ने वास्तुशिल्प के आधार पर नो ग्रहों के अनुसार नो खंडो मे इसका निर्माण किया .जयपुर मे कला और संस्कृति का प्रमुख स्थान है जो राष्ट्रीय कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत लोककलाओं और संस्कृति के प्रसार का काम करता है.शहर के प्रबुद्ध वर्ग के लोग और कलाकारों का जमावड़ा यहाँ के इंडियन कॉफी  हाउस मे लगा रहता है .शहर मे यह एक ही तो जगह है जो कलाकारों आदि लोगों को सुकून देती है . कल ही इस जवाहर कला केन्द्र ने अपना सोलहवां जन्मदिन मनाया है .कहूँ तो यह बाली उमर का  हो गया है और इसकी बाली उमर को &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; सो -सो सलाम !&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6073947251391202239-2455253543642371188?l=dineshcharan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dineshcharan.blogspot.com/feeds/2455253543642371188/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6073947251391202239&amp;postID=2455253543642371188&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/2455253543642371188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6073947251391202239/posts/default/2455253543642371188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dineshcharan.blogspot.com/2008/04/blog-post_09.html' title='तेरी बाली उम्र को सलाम'/><author><name>दिनेश चारण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08130487535112264164</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_5wgwFV28QsQ/SjuaxtTCSYI/AAAAAAAAAFU/e_5ZOLPjaQ8/S220/dinesh.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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